आधी दुनिया हमसे है




सोनिया ने अचानक ही भारत आने का फैसला कर लिया,मूल रुप से पँजाब में रहने वाले सोनिया के माता पिता बरसों पहले विदेश चले गये थे। वो वहीं इग्लैंड में पैदा हुई और वहीं पली बढी। भारत हमेशा से ही उसकी रूचि के केंद्र में रहा। यही कारण था कि उसने अपनी यही कारण था कि जनसंचार में स्नातकोत्रर परियोजना के लिये जो विषय चुना वह था, हरियाणा में स्त्री पुरुष असंतुलन। जिसकी तह में उसने पाया कि हरियाणा में पुरुष महिला अनुपात इतना असंतुलित हो चुका है कि गाँवों में लडकों को अपनी शादी के लिये लडकियाँ नहीं मिल रही। देश के अन्य इलाकों कि लडकियों से उन्हें शादी करनी पड रही है।



हरियाणा में महिलाऐं
साएना नेहवाल, ममता खब, अंजना कुठियाला, संतोष यादव, सुषमा स्वराज, कलपना चावला, मल्लिका सहरावत,सीता गोसाई, जस्जीत कौर हांडा इन सभी महिलाओं में एक समानता है की ये सभी महिलाऐं उस प्रदेश की हैं जिसके बारे में कहा जाता है की यहाँ के परिवेश में कलचर के नाम पर सिर्फ खेती ही है।यूँ तो हमेशा से ही महिलायें अपनी मेहनत, लगन, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा के लिये जानी जाती रही हैं। महिलाओं में यह भी विषेशता है की वे अपने आप को, अपने आस पास के वातावरण के अनुसार ढाल लेती हैं। हरियाणा एक शुष्क प्रदेश है यहाँ का जीवन श्रम माँगता है यही कारण है की हरियाणा की महिलायें विशेष तौर पर अपनी मेहनत और लगन के लिये जानी जाती है।



तब और अब हवा कुछ बदली जरुर है
हरियाणा में लगभग ६७५९ गाँव है। यहाँ ७० प्रतिशत लोग खेती पर निभर रहते हैं। वहाँ की महिलाऐं कठिन मेहनत करती है। वे सुबह सवेरे उठ कर डंगरो के लिये चारा काटती हैं, चारा डालती हैं, उनके गोबर को उठाती हैं, फिर उनका दूध निकालती हैं, फिर दूध बिलो कर मक्खन निकालती है। वे घर का सारा काम कर पीने के लिये पानी लाती हैं। पीने के लिये कुऐ का मटका पानी लाना, घर में सप्लाई का पानी हॊने पर भी घर के बुजुग कुऐ का पानी पीना पसंद करते हैं। वे घर, खेत व डंगरों का काम कर तिहरी भूमिका निभाती हैं।हालांकि आजकल गाँवों में बिजली आने से उनहें कई सुविधाओं मिली हैं जिससे उनका जीवन आसान हो गया है, पहले उनका पहनावा ओर रहन सहन बहुत कठिन था। वे बहुत भारी घाघरा पहनती थी। पैरों व हाथों में भारी-भारी चाँदी के गहने पहनती थीं, कानों में बङे-बङे गहने पहनती थीं, जिनहें पहनने के लिये उनको अपने कानों के छेद बङे-बङे करने पङते थे। बचपन से ही मोर के पंख की सफेद डंडियों को छोटे-छोटे टुकङों में काट कर उनहें मसल- मसल कर पतला कर कई -कई डंडियां ऐक साथ कान के छेद में डालती थी, फिर उन डंडियों पर पानी डाल कर फुला लिया जाता था, इससे उनके कानों के छेद बङे- हो जाते थे, उन में वे गहने जिनहें बुजली कहा जाता है, पहनती थीं। उनका घाघरा कम से कम दस मीटर का होता था तथा वे खास मौकों पर चालीस- चालीस मीटर के घाघरे या दो-दो एक साथ पहनती थीं॰ गले मे मोटी गंठी, गलसरी, हँसली व जोई पहनती थीं। हाथो में कङे, पाती व हथफुल पहनती थीं। पैरों के कङी व छैलकङे जो कि १०० गाम से लेकर ५०० गाम तक की चाँदी के होते थे तथा हाथों में कङे भी १०० गाम तक के होते थे वे पूरा जीवन पहनती थीं, ये गहने उनके मरने पर ही उतारे जाते थे। अपने बाल ऐसे बाँधती थी कि वे ऐक महीने तक चलते थे। अपने बाल वे खुद नहीं संवार सकती थी, हर महीने नाईन अपने यहाँ बुलवा कर वे अपने बाल बँधवाती थीं। बालों की ढेर सारी चुटीयाऐं गूंथ कर उनहें सिर के ऊपर ईकठा कर मोटे-मोटे लाल सुती धागों से बाँधा जाता था, जिसे चुटला कहा जाता था, उस चुटले पर वे पानी लाते समय मटका रखती थी। उनकी वेश-भूषा बङी असहनीय थी तथा काम बहुत कठिन थे। वे सुबह सवेरे उठ कर चक्की पर पूरे घर की जरुरत का आटा भी पीसती थी। पैरों में वे चमङे की जुतियाँ पहनती थीं, जिन्हें पहनना बहुत असहनीय होता था। अब तो हरियाणा में महिलाऐं हलके सलवार- कमीज पहनती हैं, परंपरागत भारी जेवर व लिबास उन्होंने छोङ दिया है, पर अब भी वे घर, डंगर और खेत का अधिकतर काम संभालती हैं। घर-घर में अब दूध बिलोने की मशीन आ गई हैं, आटा पीसने की मशीन आ गई हैं, चारा काटने की भी मशीनें आ गई हैं, परंतु हरियाणा में महिलाऐं अब भी कङी मेहनत करती हैं, खेतों में मशीनें आ जाने से केवल पुरूषों का काम कम हुआ है, खेत के हाथ से करने वाले सभी काम जैसे कपास चुगना, खरपतवार निकालना, फसल काटना, हरा चारा काटना व लाना सभी काम महिलाऐं करती हैं।हरियाणा कृषि विश्वविध्दयालय द्वारा किये गये एक सर्वेक्षण में पाया गया कि एक साधारण महिला की पानी लाने में ७॰७ कि्लो जाउलॉ प्रति मिनट शक्ति खर्च होती है, वह औसतन पानी लाते वक्त २४॰३ किलो वजन ऊठाती है, तथा ५॰७५ मिटर की दूरी औसतन १३८ मिनट में तय कर घर में पानी की जरूरत पूरी करती है। यह सर्वेक्षण बताता है कि पानी लाने से महिलाऔं के कंधो, कमर तथा गले में भयंकर दद होता है॰ महिलाऐं चारा लाते समय औसतन ४३।८ किलो वजन ढोती हैं तथा ३।७ कि॰मि॰ की दूरी तय करती हैं, चारा काटने में उनकी ९॰९ कि्लो जाउलॉ प्रति मिनट शक्ति खर्च होती है। वहीं कपास काटते समय उनके दिल की धङकन अधिकतम १२७ बी॰पी॰ऐम॰ तक पहुँच जाती है। कपास की फसल में तकरीबन ४-५ बार खुदाई एवं निराई-गुङाई केवल महिलाऔं की जिम्मेदारी है। हरियाणा के गाँवों में महिलाओं के मनोरंजन के साधन आपस में बातें करना, दरी बनाना, कढाई- बुनाई करना तथा कोशिया चलाना नये पकवान बनाना ही हैं॰ उनमें पहले के मुकाबले कोई अधिक बदलाव नहीं आया है॰ पहले भी महिलाओं के मनोरंजन के साधन आपस में बातें करना, दरी बनाना, कढाई- बुनाई करना तथा कोशिया चलाना नये पकवान बनाना आदी थे, ईसके अलावा वे कातती थीं, रात को कातने के लिये वे सोरातिया (ऎक तरह का मुकाबला) रखती थीं, जिसमें किसी नियत समय तक आदा किलो या पाव भर कातना होता था, कातते समय वे खुब गीत गाती थीं तथा खतम होने पर पकवान (हलवा) खाया जाता था॰ कहने का मतलब है उनके मनोरंजन के साधन भी काम से ही जुङे हैं॰
दूसरी ओर पुरुष मनोरंजन के नाम पर टी॰ वी॰ - सिनेमा देखने एवं शराब पीने पर खुब पैसा लुटाते हैं॰ महिलाओं को पिर भी कोई गुरेज नहीं वे पति को आज भी पुरी तरजिह देती हैं॰ चाहे पति उनको पिटे यह वे उसका अधिकारा समझती हैं॰ हरियाणा के सभी गाँवों में १९९१ से बिजली लगी है, घरों में टी॰ वी॰ फिज, वाशिंग मशीन, चक्की, चारा काटने की मशीन, दूध बिलोने की मशीन, आदि सब आ गये हैं, पर महिलाऐं काम के बोझ तले दबी हैं



हरियाणा में महिलाओं की संख्या, हमारा कूसुर क्या है
२००१ की जनगणना के अनुसार हरियाणा में महिलाओं और पुरूषों की जनसख्या में घनी असमानता पायी गयी। १००० के पीछे ८६१ महिलाऐं का आँकडा हरियाणा में सबसे कम है। इंडियन पिनल कोड के अंतरगत भूण हत्या गैर कानूनी है।हरियाणा के गाँवों में एक ओर महिलाऐं आज भी ढेरों संकटों से जुझ रही हैं, वहीं लङकों के मुकाबले में लङकियों का गिरता अनुपात आज सोचनीय विषय बनता जा रहा है। आज हरियाणा में लङकों की शादी के लिये लडकियाँ दूसरे जिलों से खरीद कर लई जा रही हैं, आज तक मैंनें केवल महिलाओं की जनसँख्या की कमी के बारें में पढा और सुना था पर उस समय मैं भौंचकी रह गई जब कैलिफोनिया में जनसंचार में स्नात्कोतर कर रही सोनिया, हरियाणा में पुरुष-महिलाओं में अस्तुंलन विषय पर अपनी परियोजना के तहत मेरे घर तक पहूँच गई। बकौल सोनिया जब वह जब हवाई जहाज से जापान से अमेरिका जा रही थी तब उसने जाते समय समाचार-पत्र में खबर पढी थी कि हरियाणा में लङकों की शादी के लिये लडकियाँ दूसरे शहरों खास तौर पर केरला से खरीद कर लायी जा रही हैं, सोनिया, सोनिया को टाइम्स ओफ इंडिया में उस लेख को लिखने वाली रिपोर्टर( जो की उस स्वयं संस्था की थी जिस में मेरी बहन ने काम किया था। उसी ने सोनिया को मेरे घर का पता दिया था और जब सोनिया के साथ मैंनें इस विषय का गहराई से अध्यन्न किया और कई चौकानें वाले तथ्य पता चलेनिजी अस्पतालों में धडाधड भूण हत्याये हो रही हैमहिलाओं के स्वास्थय पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। डिलिवरी के समय कई महिलाओं की मृत्यु हो रही है। यूँ तो हरियाणा में चार विश्वविध्यालय हैं और गेजुऐट स्तर पर हरियाणा सरकार ने महिलाओं की शिक्षा मुफ्त है फिर भी गाँवों में लडकियों के पढनें का स्तर बिलकुल कम है।



हरियाणा में महिलाओं के हौसले को दर्शाते ये कारनामें
हरियाणा में महिलाओं सफाई के प्रति जागरूकता को दर्शाते हुये यह नारा दिया की जिस घर में शौचालय नहीं होगा उस घर में हम अपनी बेटी को नहीं बयाहेंगें। इसी तरह शराबबंदी के विरोध में निर्वाचित सरकार को विरोध का सामना करना पडा था। जिस तरह हमारे भारतीय समाज में, महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता आयी है कुछ साकारात्मक बदलाव हरियाणा की महिलाओं में भी आये हैं वे पढाई का महत्व को समझनें लगी हैं, जमीनी सतर पर डमोकरेसी में उनकी भागीदारी बढी है, वे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हुई हैं और साथ ही साथ महिलाओं के की अपने प्रति हिंसा का विरोध करने का साहस भी आया हैपंचायती राज की रोश्नी में हरियाणा की महिलाओं में सरकार के निमाण में निचले स्तर पर भागीदारी जरुर की है। विकास के लिये महिलाओं का आत्मनिभर होना बहुत जरूरी होता है। भारत के संविधान ने महिलाओं और पुरुषों को बराबर के अधिकार दिये हैं। लेकिन आजादी के ६० वर्षो के बाद भी महिलाओं को राजनीति में प्रवेश नहीं मिल पाया इसीलिये महिलाओं को जमीनी स्तर पर प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया गया है। इससे महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता बढेगी। फिर भी महिलाओं ने अपने आप आगे बढ कर अपने और अपने आस पास के माहौल को बदलने का जो काम हरियाणा की महिलाओं ने किया है वह काबिले तारिफ है।









2 people spoke on this:

साधना वैद said...

हरियाणा की महिलाओं की दशा पर आपने बहुत ही सुन्दर शब्द चित्र प्रस्तुत किया है । हरियाणा में स्त्री पुरुषों के अनुपात में अंतर निश्चित रूप से शोचनीय है । इसके लिये वहाँ वृहद रूप से जागरूकता अभियान चलाये जाने की महती आवश्यक्ता है । जब तक सामाजिक चेतना को झिंझोड़ कर नहीं जगाया जायेगा और वहाँ की स्त्रियों को आत्म गौरव और आत्म निर्भरता का पाठ नहीं पढ़ाया जायेगा यह विडम्बना विद्यमान रहेगी । अन्य प्रदेशों की तुलना में हरियाणा प्रदेश में स्त्रियों में शिक्षा का प्रचार अभी काफी कम है इसीलिये अभी भी कन्या भ्रूण हत्या जैसी जघन्य और अमानवीय कुरीतियाँ वहाँ प्रचलित हैं । लेकिन यह शुभ संकेत है कि अब वे भी अपने अधिकारों के लिये सचेत हो रही हैं और वह दिन भी अब दूर नहीं जब शिक्षा और ज्ञान के प्रचार प्रसार से वे अपने महत्व को पहचानेंगी और इस कुरीति को मिटा कर ही रहेंगी ।

Dr. Munish Raizada said...

आपने बहुत ही सामयिक मुद्दा उठाया है. नर व् नारी के बीच भेद -भाव व् असमानता के मामले में आंकडे हरियाणा के पक्ष में नहीं हैं. भूर्ण हत्या , तथा लैंगिक असमानता में हरियाणा लिस्ट में उपर आता है ( ट्रिब्यून से आंकडा संलग्न है)
यद्धपि सरकारी नीतियां इस विषय में सुधार लाने हेतु अच्छी बनायीं गयी हैं. तथापि बुद्धिजीवी वर्ग , सामाजिक नेतृत्व प्रदान करने वाले वर्ग को इस पर ध्यान देना होगा.
The Tribune, April 9, 2007:In Bhiwani district the male-female ratio in the 2001 census in the 0 to 6 age group was 841 girls for every 1000 boys. However, two years on, in many villages the balance has tilted in favour of girls.
In a recent survey conducted by the district administration, it was found out that Balali village in Dadri subdivision has a whopping 1484 girls against 1000 boys. Likewise, Gudana has 1064, Mehrana 1035, Shishwala 1061, Tiwala 1017, Dudhwa 1294, Adampur 1207, Kaliana 1005 and Chhapaar had 1008 girls against 1000 boys

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